Friday, 23 October 2015

मैं भी मोदी जी के खिलाफ एक केस दर्ज करवा ही दूं

सोच रहा हूं कि बहती गंगा में हाथ धोते हुए मोदी जी के खिलाफ मैं भी एक केस दर्ज करवा ही दूं।
दरअसल, आज टीवी के एक विज्ञापन पर अचानक मेरी नजर गई। एक खास चाय कंपनी के इस विज्ञापन में अपने बुजुर्ग सहित बैठा अल्‍पसंख्‍यक समुदाय का एक बच्‍चा चाय को देखकर पूछता है कि क्‍या ये चाय सिर्फ उस्‍तादों के लिए है?
इसी दौरान चाय के दामों में कमी को दर्शाते हुए चाय पेश करने वाला कहता है कि नहीं…यह चाय सबके लिए है।
सवाल करने वाले बच्‍चे के हाथ में वह कांच का सस्‍ता सा ढाबे पर मिलने वाला चाय से भरा गिलास थमा देता है।
मेरी दृष्‍टि से यह मोदी राज में गरीबों का इरादतन किया गया अपमान है और वो भी एक वर्ग विशेष के लोगों को टारगेट करके किया गया है। मुझे इसमें संघ के एजेंडे की बू आती है।
मन कर रहा है कि पहले तो कांग्रेस के चिर युवा राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी जी को मोदी सरकार की इस हरकत तथा आरएसएस की मंशा से अवगत करा दूं ताकि वह समय रहते विज्ञापन में दर्शाए गए अल्‍पसंख्‍यक बंधुओं के घर जाकर उन्‍हें सांत्‍वना दे सकें और फिर किसी कोर्ट में याचिका दाखिल करके तत्‍काल मोदी सरकार के खिलाफ सख्‍त कार्यवाही कराने में लग जाऊं।
कुछ अक्‍ल से पैदल लोग इस आशय का सवाल खड़ा कर सकते हैं कि एक प्राइवेट कंपनी की चाय के विज्ञापन से मोदी जी या उनकी सरकार का क्‍या लेना-देना।
मेरा ऐसे सभी कालीदासों को एक ही जवाब है कि देश के एक अदद प्रधानमंत्री चूंकि मोदी जी हैं इसलिए मामला किसी प्राइवेट कंपनी की चाय का हो या उसमें मिले दूध को देने वाली भैंस का, जिम्‍मेदार तो मोदी जी ही हैं क्‍योंकि मोदी जी इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों सहित उन जीव-जंतुओं के भी प्रधानमंत्री हैं जिन्‍हें बिना किसी कागजात के भारतीय होने का जन्‍मसिद्ध अधिकार प्राप्‍त है।
ऐसे में चाय कंपनी और उसके द्वारा दिए गए विज्ञापन के लिए मोदी जी की सीधी जिम्‍मेदारी बनती है क्‍योंकि प्रश्‍न किसी निजी या सरकारी कंपनी का नहीं है, प्रश्‍न प्रधानमंत्री होने का है। इन हालातों में मोदी जी पर मेरे द्वारा मुकद्दमा दर्ज कराना बनता है।
इसी तरह कुछ सिरफिरे लोग कहते हैं कि दादरी की घटना से मोदी जी की सरकार का क्‍या वास्‍ता।
मैं पूछना चाहता हूं कि दादरी किस प्रदेश में है….उत्‍तर प्रदेश में ना। और उत्‍तर प्रदेश किस देश में है…भारत में ना। भारत के प्रधानमंत्री कौन हैं…मोदी जी ना।
अब आप ही बताइए कि उत्‍तर प्रदेश का दादरी की घटना से कोई मतलब रह जाता है क्‍या। सारा मतलब तो मोदी जी का ही है।
सही कहते हैं यूपी के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव कि उत्‍तर प्रदेश को बीच में घसीटना विरोधियों की साजिश का हिस्‍सा है।
अखिलेश की इस बात में भी दम है कि उत्‍तर प्रदेश ने उनके राज में जितना विकास किया है, उतना तो आज तक किसी राज में हुआ ही नहीं लिहाजा जल-भुनकर कुछ शरारती तत्‍व (जस्‍ट लाइक मोदी जी) उनकी सरकार को लॉ एंड ऑर्डर के नाम पर बदनाम कर रहे हैं।
इतिहास ही नहीं, मैं भी गवाह हूं कि अखिलेश के राज में उत्‍तर प्रदेश ने जो मुकाम हासिल किया है, वह न तो कोई आज तक कर पाया और न भविष्‍य में किसी के द्वारा कर पाने की उम्‍मीद है।
पूरा समाजवादी कुनबा जिसमें मात्र डेढ़ दर्जन लोग हैं, उत्‍तर प्रदेश के उत्‍तरोत्‍तर विकास में सतत् प्रयत्‍नशील हैं। है कोई माई का लाल जिसके परिवार से पूरे 18 लोग अपने प्रदेश की सेवा कर रहे हों।
प्रदेश तो छोड़िए देश में ही बता दीजिए।
मोदी जी से तो इसका जिक्र तक करना बेकार है। जो अपनी एक अदद बीबी को छोड़कर राजनीति करने चले आए वो क्‍या समझेंगे कि मुलायम के समाजवाद में बहुविवाह केवल किया ही इसलिए जाता है जिससे भरे-पूरे परिवार के साथ प्रदेश और संभव हो तो देश सेवा की जा सके।
मैं यहां स्‍पष्‍ट कर देना चाहता हूं कि समाजवादियों द्वारा की जा रही देश की सेवा में मोदी जी का कोई हाथ नहीं है। हालांकि समाजवादी कुनबे को लेकर मोदी जी के मुलायम रवैये पर कुछ विरोधी शंका करते हैं परंतु उनकी शंका निराधार है। मोदी जी उत्‍तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था के लिए जिम्‍मेदार हैं और रहेंगे परंतु उत्‍तर प्रदेश की सरकार चलाने वाले समाजवादी कुनबे के निजी कामकाज में उनका कोई हस्‍तक्षेप नहीं है। इसकी पुष्‍टि संभवत: मुलायम सिंह और अखिलेश यादव भी कर देंगे।
इधर दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री माननीय श्री अरविंद केजरीवाल को दिल्‍ली की पुलिस अपने अधीन चाहिए। पुलिस न हुई शोले का ठाकुर हो गया जिससे गब्‍बर कहता है- ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर…ये हाथ मुझे दे दे।
केजरीवाल की मानें तो पुलिस मिलते ही वह पूरी दिल्‍ली को सुधार कर रख देंगे।
केजरीवाल ने दबी जुबान से कहा भी है कि मोदी कितनी ही विदेश यात्राएं कर लें, लौटना तो दिल्‍ली ही होता है। एकबार पुलिस मेरे हाथ आ गई तो मोदी जी मेरे हाथ अपने आप आ जायेंगे।
केजरीवाल के अनुसार वह शीला दीक्षित नहीं हैं जो चुप होकर बैठ जायेंगे। वह मोदी जी को तब तक चैन से नहीं सोने देंगे जब तक दिल्‍ली पुलिस उन्‍हें नहीं सौंप दी जाती।
केजरीवाल जी को कौन समझाए कि दिल्‍ली पुलिस मिल गई उन्‍हें तो कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली का ठीकरा किसके सिर फोड़ेंगे। हालांकि वह भी अपने सारे व्‍यक्‍तिगत और सरकारी कार्यों के लिए मोदी जी को ही जिम्‍मेदार ठहराते हैं।
मेरे जैसे किसी सलाहकार की बात मानी होती केजरीवाल जी, तो जितेन्‍द्र तोमर की फर्जी डिग्री से लेकर सोमनाथ भारती तक पर दर्ज मामलों के लिए मोदी को जिम्‍मेदार ठहराया जा सकता था।
जितेन्‍द्र तोमर की डिग्री कहीं से बनी हो, है तो वह भारत का ही हिस्‍सा। और भारत के किसी कोने में कुछ हो, मोदी जी जिम्‍मेदार होंगे ही।
सोमनाथ भारती की बीबी अपने ही घर में सुरक्षित नहीं है, सोमनाथ उसे रोज पीटते थे। मोदी जी क्‍या कर रहे थे। दिल्‍ली पुलिस मोदी जी की, दिल्‍ली मोदी जी की…तो दिल्‍ली में रह रही अबला नारी की सुरक्षा का जिम्‍मा मोदी जी का नहीं था क्‍या।
मोदी जी को तभी इस्‍तीफा सौंप कर केजरीवाल की शरण में आ जाना चाहिए था जब पता लगा कि सोमनाथ अपनी बीबी लिपिका मित्रा को पीटा करते थे और उसने उनके खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करा दिया है।
ऐसे में बहिन मायावती की भी बात को दरकिनार नहीं किया जा सकता। उनका सही कहना है कि दलितों की कुत्‍ते से तथाकथित तुलना करने पर अपने मंत्री को या तो तुरंत बर्खास्‍त करके जेल में डलवाएं या मान लें कि वो दलित विरोधी हैं।
जैसे आज तक बहिन जी ने उन्‍हें दलितों के हिमायती होने का तमगा दे रखा था।
बहिन जी! पूरा देश जानता है कि जिस तरह प्रदेश रहित इस देश के हर हिस्‍से में घटने वाली घटना के लिए सिर्फ और सिर्फ मोदी जी जिम्‍मेदार हैं, उसी तरह बिना किसी सीमा रेखा के देशभर के दलितों की आप इकलौती बहिन हैं। दलित कहीं का हो, लेकिन राखी बंधवाने वह आपके पास ही आता है।
आप अपने किसी भाई का अपमान कैसे सह सकती हैं, सहना भी नहीं चाहिए। मोदी जी के मंत्री की इतनी हिमाकत हुई कैसे…इसकी सीबीआई जांच लाजिमी है। और हां…जांच होती रहेगी लेकिन पहले मोदी जी वीके सिंह को बर्खास्‍त करके तिहाड़ भेजें।
मोदी जी ऐसा नहीं करते तो यह भी स्‍वत: सिद्ध हो जाता है कि वीके सिंह ने जो कुछ कहा, वह सब मोदी जी के इशारे पर कहा इसलिए अगली प्रेस कॉफ्रेंस में हम कुत्‍ते वाली बात के लिए मोदी जी को जिम्‍मेदार मानते हुए उनकी बर्खास्‍ती की मांग करेंगे और संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ से अपील करेंगे वह उन्‍हें जेल भेजे।
संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ पर याद आया कि बेचारे आजम खान जी भी देश में आपातकाल लागू करने की फरियाद राष्‍ट्रपति से कर चुके हैं। उन्‍हें पूरा देश ही खतरे में दिखाई दे रहा है।
मैंने सुना है कि जब से यूपी पुलिस ने उनकी चोरी हुई भैंसें बरामद करके दी हैं, तब से आजम खान उत्‍तर प्रदेश को संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ और चचा मुलायम सिंह को बान की मून समझने लगे हैं।
पता नहीं यह उनके दिमाग का कोई फितूर है या ओवैसी तथा जामा मस्‍जिद के शाही इमाम की बातों का असर कि वह अब संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ से नीचे बात ही नहीं करते।
मुलायम सिंह और अमर सिंह की मुलाकात पर आपत्‍ति जताते हुए भी उन्‍होंने यही कहा था कि वो इस मामले को संयुक्‍त राष्‍ट्र तक ले जायेंगे। देश का मुसलमान यहां सुरक्षित नहीं है। मोदी जी के इशारे पर मुलायम सिंह और अमर सिंह की मीटिंग फिक्‍स की जा रही है। नेताजी (मुलायम सिंह जी) को यादव सिंह मामले में सीबीआई का डर दिखाकर अमर सिंह के गले में हाथ डालने पर मजबूर कर रहे हैं देश के बादशाह मोदी जी। लेकिन मैं चुप होकर सहने वालों में से नहीं हूं। वह चाहें तो मेरी भैंस फिर खुलवा लें, चाहें तो ओवैसी और अमर को मेरे खिलाफ खड़ा कर दें लेकिन मैं किसी से डरने वाला नहीं। मैं देश के सबसे बड़े सूबे का सर्वाधिक प्रभावशाली मंत्री हूं। मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
जनाब आजम खां साहब सच कह रहे हैं। उनका कोई कुछ बिगाड़ सकता तो वह बेलगाम कैसे होते। इसके लिए भी मोदी जी जिम्‍मेदार हैं।
बहरहाल, मोदी जी का चाय से बहुत गहरा नाता है और इसलिए चाय के विज्ञापन में गरीब अल्‍पसंख्‍यकों का उड़ाया गया मजाक मुझे कतई बर्दाश्‍त नहीं हुआ लिहाजा मैं मोदी जी को उसके लिए तहेदिल से जिम्‍मेदार मानते हुए एक अदद केस दर्ज कराने जा रहा हूं।
आप के पास कोई ऐसा मामला मोदी जी के खिलाफ हो तो आप भी लग लीजिए मेरे साथ। पता नहीं आगे कभी ऐसा सुअवसर हाथ आया कि नहीं आया।
-यायावर

Friday, 28 August 2015

मथुरा की कानून-व्‍यवस्‍था भी ”समाजवादी”

यूं तो समूचे सूबे में कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली के उदाहरण हर रोज सामने आते हैं लेकिन यदि बात करें सिर्फ विश्‍व विख्‍यात धार्मिक जनपद मथुरा की तो ऐसा लगता है कि यहां कानून-व्‍यवस्‍था भी ”समाजवादी” हो गई है।
मसलन…जाकी रही भावना जैसी। जिसे अच्‍छी समझनी हो, वो अच्‍छी समझ ले और जिसे बदहाल समझनी हो, वो बदहाल समझ ले। इस मामले में अभिव्‍यक्‍ति की पूरी स्‍वतंत्रता है।
वैसे आम आदमी जो न समाजवादी है और न बहुजन समाजी है, न कांग्रेसी है और न भाजपायी है, न रालोद का वोटर है और न वामपंथी है…उसके अनुसार यहां कानून-व्‍यवस्‍था अब केवल एक ऐसा मुहावरा है जिसका इस्‍तेमाल अधिकारीगण अपनी सुविधा अनुसार करते रहते हैं।
कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली में तैनात होने वाले अधिकारियों को यह सुविधा स्‍वत: सुलभ हो जाती है क्‍योंकि यहां नेता और पत्रकार केवल दर्शनीय हुंडी की तरह हैं। अधिकांश नेता और पत्रकारों का मूल कर्म दलाली और मूल धर्म चापलूसी बन चुका है।
चोरी, डकैती, हत्‍या, लूट, बलात्‍कार, बलवा जैसे तमाम अपराध हर दिन होने के बावजूद मथुरा के नेता और पत्रकार अपने मूल कर्म व मूल धर्म को निभाना नहीं भूलते।
कहने को यहां सत्‍ताधारी समाजवादी पार्टी की एक जिला इकाई भी है और उसके पदाधिकारी भी हैं लेकिन उनका कानून-व्‍यवस्‍था से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं।
दरअसल वो कन्‍फ्यूज हैं कि कानून-व्‍यवस्‍था के मामले में किसकी परिभाषा को उचित मानकर चलें।
जैसे प्रदेश पुलिस के मुखिया कहते हैं कि कानून-व्‍यवस्‍था नि:संदेह संतोषजनक नहीं है। पार्टी के मुखिया का भी यही मत है। वो कहते हैं कि यदि आज की तारीख में चुनाव हो जाएं तो पार्टी निश्‍चित हार जायेगी। उनके लघु भ्राता प्रोफेसर रामगोपाल की मानें तो स्‍थिति इतनी बुरी भी नहीं है जितनी प्रचारित की जा रही है। जबकि ”लिखा-पढ़ी” में मुख्‍यमंत्री पद संभाले बैठे अखिलेश यादव का कहना है कि उत्‍तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था उत्‍तम है और यहां का पुलिस-प्रशासन बहुत अच्‍छा काम कर रहा है। दूसरे राज्‍यों से तो बहुत ही बेहतर परफॉरमेंस है उसकी।
ऐसे में किसकी परिभाषा को सही माना जाए और किसे गलत साबित किया जाए, यह एक बड़ी समस्‍या है।
मथुरा में एक पूर्व मंत्री के घर चोरी होती है तो कहा जाता है कि सुरक्षा बढ़वाने के लिए ऐसा प्रचार किया गया है। व्‍यापारी के यहां डकैती पड़ती है तो बता दिया जाता है कि पुराने परिचित ने डाली है। समय मिलने दो, पकड़ भी लेंगे। हाईवे पर वारदात होती है तो अगली वारदात का इंतजार इसलिए करना पड़ता है जिससे पता लग सके कि अपराधियों की कार्यप्रणाली है क्‍या। वो हरियाणा से आये थे या राजस्‍थान से। यह भी संभव है कि उनका राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सीधा कनैक्‍शन हो।
हां, इस बीच कुछ उचक्‍के टाइप के बदमाश पकड़ कर गुड वर्क कर लिया जाता है जिसे स्‍थानीय मीडिया पूरा कवरेज देकर साबित कर देता है कि मथुरा का पुलिस-प्रशासन निठल्‍ला चिंतन नहीं कर रहा। साथ में काम भी कर रहा है। एक्‍टिव है।
थोड़े ही दिन पहले की बात है जब मथुरा पुलिस की स्‍वाट टीम का बड़ा कारनामा जाहिर हुआ। बिना काम किए वैसा कारनामा कर पाना संभव था क्‍या।
स्‍वाट टीम के कारनामे ने साबित कर दिया कि वह दिन-रात काम कर रही है। यह बात अलग है कि वह काम किसके लिए और क्‍यों कर रही है। इस बात का जवाब देना न स्‍वाट टीम के लिए जरूरी है और न उनके लिए जिनके मातहत वह काम करती है। जांच चल रही है…नतीजा निकलेगा तो बता दिया जायेगा। नहीं निकला तो आगे देखा जायेगा।
आज यहां एसएसपी डॉ. राकेश सिंह हैं, इनसे पहले मंजिल सैनी थीं। उनसे भी पहले नितिन तिवारी थे। अधिकारी आते-जाते रहते हैं, कानून-व्‍यवस्‍था जस की तस रहती है। अधिकारी अस्‍थाई हैं, कानून-व्‍यवस्‍था स्‍थाई है।
मथुरा में हर अधिकारी सेवाभाव के साथ आता है। कृष्‍ण की पावन जन्‍मभूमि पर मिली तैनाती से वह धन्‍य हो जाता है। उसे समस्‍त ब्रजवासियों और ब्रजभूमि में आने वाले लोगों के अंदर कृष्‍णावतार दिखाई देने लगता है।
कृष्‍णावतार पर कानून का उपयोग करके वह इहिलोक और परलोक नहीं बिगाड़ना चाहता। बकौल मुलायम सिंह कृष्‍ण भी तो समाजवादी थे। यादव थे…इसका मतलब समाजवादी थे।
यहां कहा भी जाता है कि सभी भूमि गोपाल की। जब सब गोपाल का है तो गोपालाओं का क्‍या दोष। वह तो समाजवादी कानून के हिसाब से ही चलेंगे ना।
कृष्‍ण की भूमि पर तैनाती पाकर उसकी भक्‍ति में लीन अधिकारी इस सत्‍य से वाकिफ हो जाते हैं कि एक होता है कानून…और एक होता है समाजवादी कानून।
समाजवादी कानून सबको बराबरी का दर्जा देता है। लुटने वाले को भी और लूटने वाले को भी। पिटने वाले को भी और पीटने वाले को भी।
कागजी घोड़े सदा दौड़ते रहे हैं और सदा दौड़ते रहेंगे। बाकी अदालतें हैं न। वो भी तो देखेंगी कि कानून क्‍या है और व्‍यवस्‍था क्‍या है। कानून समाजवादी है और व्‍यवस्‍था मुलायमवादी है। चार लोग रेप नहीं कर सकते, इस सत्‍य से पर्दा हर कोई नहीं उठा सकता। पता नहीं ये गैंगरेप जैसा घिनौना शब्‍द किस मूर्ख ने ईजाद किया और किसने कानून का जामा पहना दिया।
उत्‍तर प्रदेश ऐसे कानून को स्‍वीकार नहीं करता। नेताजी को रेप स्‍वीकार है, रेपिस्‍ट स्‍वीकार हैं…गलती हो जाती है किंतु गैंगरेप स्‍वीकार नहीं क्‍योंकि वह गलती से भी नहीं किया जा सकता। संभव ही नहीं है।
ठीक उसी तरह जैसे कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली संभव नहीं है। वह कुछ गैर समाजवादी विरोधी दलों के दिमाग की उपज है। उनके द्वारा किया जाने वाला दुष्‍प्रचार है।
कानून-व्‍यवस्‍था कैसे बदहाल हो सकती है। वो बदहाल कर तो सकती है, खुद बदहाल हो नहीं सकती।
-लीजेंड न्‍यूज़

Wednesday, 19 August 2015

रंग रंगीली दुनिया, रंग रंगीले लोग

ये दुनिया जितनी रंग रंगीली है, उतने ही रंग रंगीले हैं लोग। लोगों को और रंगीन बनाती हैं उनकी आदतें। वो आदतें जिनसे हास्‍य उपजता है। ऐसा हास्‍य जो न समय देखता है, न स्‍थान। न मौका देखता है, न मौके की नज़ाकत। रंग रंगीली दुनिया के रंग रंगीले लोगों की आदतों से उपजी ऐसी ही कुछ विषम स्‍थिति-परिस्‍थितियों पर गौर फरमाइए।
दो दिन पहले मेरे एक पड़ोसी बदहवास सी हालत में आए। मैंने उनकी सूरत को देखते हुए पूछा- क्‍या हुआ, कुछ परेशान नजर आ रहे हैं।
कहने लगे- ”पता चली” मेरी बीबी 6 माह से प्रेगनेंट है। मैंने उत्‍सुकतावश पूछा- भाभीजी 6 माह से प्रेगनेंट हैं और आपको अब जाकर पता चला है।
इस पर उनका जवाब था- मजाक मत करो भाई… ”पता चली” उसे परेशानी हो रही है। कोई डॉक्‍टर बताओ।
दरअसल, ”पता चली” उनका तकिया कलाम है और वो हर वाक्‍य का आदि और अंत ”पता चली” के साथ करते हैं।
वो अगर अपने यहां पुत्र रत्‍न प्राप्‍त होने जैसा शुभ समाचार भी अपने श्रीमुख से देंगे तो विद् तकिया कलाम ही डिलीवर करेंगे। कहेंगे…”पता चली” मैं आज बेटे का बाप बन गया हूं।
यह परेशानी अकेले मेरे पड़ोसी की ही नहीं है। बहुतों के साथ होती है। राष्‍ट्रीय स्‍तर पर भी इसके एक-दो नहीं अनेक उदाहरण मिल जायेंगे।
आश्‍चर्य की बात यह है कि इस परेशानी के शिकार लोगों को इस बात का अहसास तक नहीं होता कि वह कई मौकों पर उसके कारण मजाक का पात्र बन जाते हैं।
हमारे देश की राष्‍ट्रीय पार्टी के एक राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेता हैं। उनका तकिया कलाम है ”भैया”।
वह हर एक वाक्‍य का प्रथम और अंतिम चरण ”भैया” से पूरा करते हैं।
उदाहरण के लिए कुछ ग्रामीणों के बीच कल ही वह बोल रहे थे- ”भैया” मैं प्रधानमंत्री से पूछना चाहता हूं कि ”भैया” वह देश को मूर्ख क्‍यों बना रहे हैं। ”भैया” आप तो जानते ही हैं ”भैया” कि एक दिन मेरी मम्‍मी ने मुझसे कहा कि ”भैया” ये राजनीति एक जहर के समान है ”भैया”।
मैं छोटा था तब अपने ”पिता” से पूछा करता था- ”भैया” आप राजनीति से इतने दिनों तक दूर क्‍यों रहे।
मैं अपनी मां से भी पूछता हूं कि ”भैया” आप मुझे मेरे हिसाब से राजनीति क्‍यों नहीं करने देतीं।
अपने जीजा से भी एक दिन कहा था कि ”भैया” अगर आप राजनीति में सक्रिय होना चाहते हैं तो आपका स्‍वागत है ”भैया”।
मेरी बहन कभी जब मुझे लेकर काफी चिंतित हो जाती है तो मैं उससे भी कहता हूं- ”भैया” परेशान होने की जरूरत नहीं है।
पप्‍पू कभी न कभी पास जरूर होता है ”भैया”, यह बात आप भी जानते हैं ”भैया”।
राजनीति के ही एक और युवा महारथी हैं। सॉफ्ट समाजवादी से उपजे इन महारथी का तकिया कलाम ”पाल्‍टी” है। वैसे वो वहां ‘पार्टी” बोलना चाहते हैं किंतु विरासत में मिली ”पाल्‍टी” को पाल्‍टी ही बोलते हैं और उसे ही उन्‍होंने तकिया कलाम बना लिया है।
चंद रोज पहले वह एक जगह मंच से बोल रहे थे- ”हमाई पाल्‍टी” ने जितना काम प्रदेश में किया है, उतना आजतक किसी ”पाल्‍टी” ने नहीं किया। ”हमाई पाल्‍टी” नीति, नैतिकता, सिद्धांत और कथनी व करनी की समानता के आधार पर चलती है। ”हमाई पाल्‍टी” को हमाई ही पाल्‍टी के कुछ कार्यकर्ता बदनाम कर रहे हैं। हमाई पाल्‍टी चाहती है कि वह थाने की राजनीति न करें और जमीन पर आएं।
आदत से मजबूर एक बार तो वह एक कार्यक्रम में अपने बच्‍चों की तरफ इशारा करते हुए बोल बैठे- ”हमाई इस पाल्‍टी” की नींव हमारे नेताजी ने रखी थी।
एक्‍चुअली वो अपने ”पिताजी” को ”नेताजी” कहकर ही संबोधित करते हैं। तकिया कलाम के चक्‍कर में वह बच्‍चों को ”पाल्‍टी” और पिताजी को ”पाल्‍टी की नींव” रखने वाला बता गए।
ऐसे लोगों के साथ एक समस्‍या यह और होती है कि उन्‍हें खुद समझ में नहीं आता कि उनका तकिया कलाम दूसरों के लिए मनोरंजन का साधन बन रहा है।
देश के ”सबसे तेज” न्‍यूज़ चैनल के एक न्‍यूज़ एंकर का तकिया कलाम है ”इस दौर में” और ”यूं कहें कि” ”दरअसल” आदि-आदि ।
नरेन्‍द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर जब अपने चैनल की ओर से रात्रिकालीन सेवा प्रस्‍तुत करने आए तो उचक-उचक कर कहने लगे- ”दरअसल” ”इस दौर में” में नरेंद्र मोदी को उम्‍मीद से कहीं अधिक सीटें हासिल हो गईं या ”यूं कहें कि” उन्‍हें स्‍पष्‍ट बहुमत मिल गया है। ”दरअसल” ”इस दौर में” वो प्रधानमंत्री पद की शपथ 26 मई को लेने जा रहे हैं या ”यूं कहें कि” वो 26 मई को शपथ लेंगे।
”दरअसल” यह एंकर महाशय खड़े होकर समाचार वाचन करते हैं और जितनी देर तक स्‍क्रीन पर अपनी उपस्‍थिती दर्ज कराते हैं, उतनी देर तक पंजों के बल उचकते रहते हैं।
”दरअसल” सही करते हैं वो क्‍योंकि मुझे भी ”इस दौर में” डर है कि बैठकर समाचार पढ़ने के बाद वह कैमरे की जद में आ भी पायेंगे या नहीं। या ”यूं कहें कि” दिखाई देंगे भी या नहीं।
कहने को वो राष्‍ट्रीय स्‍तर के अंतर्राष्‍ट्रीय पत्रकार हैं किंतु कभी-कभी समझ में नहीं आता कि उनके तकिया कलाम को हम क्‍या समझें क्‍योंकि हम जानते हैं समझना हमें ही होगा, वह ”इस दौर में” में समझने को तैयार नहीं हैं।
समझने को तो हम भी तैयार नहीं हैं और इसलिए उनकी बातों से ज्‍यादा ध्‍यान हम उनके तकिया कलाम पर देते हैं अन्‍यथा ”पता चली” ”भैया” हमें ”हमाई पाल्‍टी” के नेताजी जो इतना अच्‍छा काम कर रहे हैं, थोड़ा-बहुत ध्‍यान उन पर भी दिया होता।
”दरअसल” ”इस दौर में” हम इतने स्‍वार्थी हो गए हैं कि हमें अपने अलावा किसी और की अच्‍छाई नजर नहीं आती या ”यूं कहें कि” दिखाई नहीं देती।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

Monday, 17 August 2015

काश…पढ़-लिखकर मेरे बच्‍चे नेता बनें

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
मैं चाहता हूं कि मेरे बच्‍चे पढ़-लिखकर नेता बनें। वैसे हमारे देश में नेता बनने के लिए पढ़ाई-लिखाई मस्‍ट नहीं है लेकिन फिर भी मैं चाहता हूं कि मेरे बच्‍चे पढ़-लिखकर ही नेता बनें ताकि उन्‍हें संसद में बोलने या किसी बड़ी हस्‍ती की मौत पर शोक संदेश लिखने के लिए नकल की पर्ची साथ ले जाने की जरूरत न पड़े।
मुझे आज तक यह बात समझ में नहीं आई कि देश के अधिकांश मां-बाप अपने बच्‍चों को पढ़ा-लिखाकर डॉक्‍टर, इंजीनियर, ब्‍यूरोक्रेट आदि ही क्‍यों बनाना चाहते हैं जबकि नेतागीरी में बिना पढ़े-लिखे भी फ्यूचर जितना ब्राइट है, उतना किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं है। पढ़-लिख लिए तो सोने पर सुहागा जैसी कहावत चरितार्थ होती है।
नेतागीरी में न सिर्फ अपना बल्‍कि अपनी कई पीढ़ियों का भविष्‍य सुरक्षित करने का कितना स्‍कोप है, इसके एक-दो नहीं अनगिनित उदाहरण आंखों के सामने हैं।
गुजरे जमाने के नेताओं की बात यदि ना की जाए तो आज का पप्‍पू नकल की पर्चियों से राजनीति में पास होने के लिए स्‍वतंत्र है। मजे की बात यह है कि सड़क से संसद तक नकल करते पकड़े जाने के बाद भी उसे ”बुक” नहीं किया जाता और तमाम लोग उसके पक्ष में सामने आकर खड़े हो जाते हैं।
यही एकमात्र ऐसा फील्‍ड है जहां हर माल बारह आने के हिसाब से बिकता है। इस फील्‍ड में गधे, घोड़े और खच्‍चर सब का मोल एक है। बारहवीं जमात ही पास करके कोई मानव संसाधन विकास मंत्री बन सकता है तो कोई हाईली एजुकेटेड होने या सेना का अवकाश प्राप्‍त जनरल होने पर भी राज्‍यमंत्री बनता है। बमुश्‍किल आठवीं जमात पास साध्‍वी महत्‍वपूर्ण विभाग का पदभार संभाल लेती हैं परंतु अच्‍छे-खासे पढ़-लिखकर आईएएस बनने वाले उनके अधीनस्‍थ हाथ बांधकर खड़े रहने पर मजबूर हैं।
तमाम नेता तो ऐसे हैं देश में जिन्‍हें डिग्रीधारी बनाकर उनकी यूनिवर्सिटी आज खुद को धन्‍य महसूस करती है। उसे मानना पड़ता है कि उनकी डिग्री में दम है।
कल स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से दिए गए भाषण को लेकर किसी सिरफिरे पत्रकार ने एक कायाकल्‍पी नेता से सरेआम पूछ डाला कि आज के भाषण पर आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है?
कायाकल्‍पी नेता ने औपचारिक रूप से तो कैमरे के सामने कहा कि आज का दिन राजनीति के लिए नहीं है लिहाजा कल प्रतिक्रिया देंगे…लेकिन कैमरा ऑफ होते ही वह पत्रकार पर चढ़ बैठे।
कहने लगे कि यार तुम कतई बौड़म हो क्‍या, जानते नहीं कि अभी प्रतिक्रिया देने के लिए हमारे नोट्स तैयार नहीं हुए हैं, कल तक नोट्स तैयार हो जायेंगे तो हम खुद-ब-खुद प्रतिक्रिया देने चले आयेंगे। आज सब छुट्टी मना रहे हैं।
बहरहाल, बात हो रही थी नेतागीरी में स्‍कोप की। देश की दोनों बड़ी पार्टियों में राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष के पद को सुषोभित करने वालों की शैक्षिक योग्‍यता का इल्‍म ”गूगल बाबा” तक को नहीं है। आरटीआई जैसा हथियार भी इनकी शैक्षिक योग्‍यता के सामने हथियार डाल देता है। विश्‍वास न हो तो इस मुद्दे पर आरटीआई डालकर देख लो। कश्‍मीर से लेकर कन्‍याकुमारी तक कोई कुछ बता दे, तो राधे मां के चरण पकड़ लेना जाकर। उसके बाद मुक्‍ति के मार्ग केवल वही बता पायेंगी। आसाराम बेचारे निराश हैं अन्‍यथा वो भी बता सकते थे। तिहाड़ जाने का जुगाड़ कर सको तो वो आज भी बता देंगे। जेबरी भले ही जल गई हो किंतु बल ज्‍यों के त्‍यों हैं। बाबा रामपाल अपनी करनी का फल भुगत रहे हैं अन्‍यथा वो भी बड़े उद्धारक हैं।
सेबी ने बेचारे सहारा को बेसहारा कर दिया है और वो खुद सुप्रीम कोर्ट के सहारे अपने दिन काट रहे हैं वर्ना नेताओं की उनके पास भी कभी अच्‍छी काट हुआ करती थी। आज नेता उन्‍हें काट रहे हैं।
यानि ”सब पर भारी अटलबिहारी” जैसे नारे की तरह नेतागीरी सब पर भारी पड़ती है। आम के आम और गुठलियों के भी दाम। बुढ़ापे तक साथ देती है राजनीति। इसमें न कोई ”भूत” होता है और न ”पूर्व”। उम्र का आंकड़ा तो जैसे पानी भरता है नेताओं के सामने। ऐसा नहीं होता तो कब्र में पैर लटकाए बैठै नेताजी के दामन से इस आशय का दाग नहीं धुल पाता कि ”न नर हैं न नारी हैं, नारायण….तिवारी हैं”। मौके देती है नेतागीरी, भरपूर मौके। तभी तो कोई पूर्व मुख्‍यमंत्री अपनी बेटी की उम्र वाली टीवी एंकर से इश्‍क लड़ाता है और कोई महिला मंत्री अपने बेटे की उम्र के लड़के से आईस-पाईस का खेल खेलती है।
इतना सब-कुछ समझाने-बुझाने के बावजूद मुझे शक है कि मेरे बच्‍चे मेरी सलाह मानेंगे। उनके अपने (कु) तर्क हैं। वो कहते हैं नेतागीरी के अलावा भी इस देश में एक फील्‍ड और ऐसा है जहां पढ़ाई-लिखाई पानी भरती है।
उनके ज्ञान के सामने में तब नतमस्‍तक हो गया जब उन्‍होंने भारत रत्‍न से लेकर खेल रत्‍न तक और पद्म पुरस्‍कारों से लेकर द्रोणाचार्य पुरस्‍कार तक का हिसाब दे डाला। साथ ही मेरे सामने भी प्रश्‍न उछाल दिया कि इनमें से किसी की शैक्षिक योग्‍यता का आपको पता है।
और हां, इन्‍हें भी छोड़ दें तो बॉलीवुड भरा पड़ा है अंगूठा टेक लेकिन भरी जवानी में तमाम पुरस्‍कारों से नवाजे जा चुके अदाकारों से। वहां भी कीमत कागजी पढ़ाई की नहीं, जुबानी जमाखर्च की है। पर्ची का वहां भी उतना ही महत्‍व है जितना कि नेतागीरी में। पर्ची पर लिखकर मिले डायलॉग जो जितना अच्‍छा डिलीवर कर लेगा, उसका उतना ही महत्‍व बढ़ जायेगा।
कहते हैं कि पर्ची से नकल के लिए भी अकल की जरूरत होती है…लेकिन यहां तो उसमें भी लगातार फेल होने वाला पप्‍पू नेतागीरी में पास है। बार-बार पकड़ा जाता है और फिर भी लोग कहते हैं कि बूढ़ा तोता पता नहीं कहां से ऐसी कोई हरी मिर्च खाकर लौटा है कि उलटा नाम बांचकर भी बाल्‍मीकि की तरह ब्रह्मज्ञानी कहला रहा है।
राम-राम को मरा-मरा पढ़कर ज्ञान सिर्फ नेतागीरी में ही संभव है।
मैं इसीलिए यही चाहता हूं कि मेरे बच्‍चे पढ़-लिखकर नेतागीरी ही करें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

‘ऊपरवाला’ सिर्फ ‘ईश्‍वर’ का ही पर्यायवाची नहीं

 -सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
अगर आप इस गलतफहमी में जी रहे हैं कि ”ऊपरवाला” सिर्फ ”ईश्‍वर” का ही पर्यायवाची है, तो आप अपनी इस गलतफहमी को दूर कर लें। ”ऊपरवाले” के अब और भी मतलब है, और वही मतलब सार्थक हैं। वही अपनी महत्‍ता को साबित करते हैं।
उदाहरण के लिए भगवान कृष्‍ण का धाम कहलाने वाले हमारे मथुरा जिले में पिछले काफी समय से बिजली कुछ उसी तरह कभी-कभी चमकती है जैसे आकाशीय बिजली चमकती है। ये बात अलग है कि बिजली पूरी आये या ना आये बिल पूरा आता है।
बिजली की इस जालिम अदा के बारे में आप किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी से पूछ कर देख लीजिए, उसका एक ही टका सा जवाब होता है कि बिजली तो ”ऊपर” से ही नहीं है।
”ऊपरवाला” के शॉर्टकट ”ऊपर” को आप नहीं समझते तो यह आपकी बुद्धि के दिवालिएपन की निशानी है, इसमें बिजली विभाग के कर्मचारियों का कोई दोष नहीं है।
इस नए जमाने का ”ऊपरवाला” यूं तो लखनऊ में बैठता है किंतु वह यत्र-तत्र-सर्वत्र व्‍याप्‍त है। वह आकाश में भले ही न रहता हो किंतु आकाश मार्ग से कहीं भी पहुंच सकता है।
”ऊपरवाला” कहलाने के अब तक हासिल ‘ईश्‍वर’ के पेटेंट पर अब उसका एकाधिकार न सही, लेकिन सर्वाधिकार तो है ही।
यही कारण है कि जब-जब बिजली जाती है, तमाम तुच्‍छ प्राणी इस ऊपरवाले की ओर निहारने लगते हैं।
ऊपरवाले का तमगा प्राप्‍त कृष्‍ण अगर यदुवंशी थे तो लखनऊ में बैठा यह ऊपरवाला भी खुद को यदुवंशी कहता है। डीएनए मिलता है या नहीं, इसका जवाब तो मोदी जी और नीतीश कुमार ही दे सकते हैं क्‍योंकि दोनों को डीएनए की खोज में महारथ हासिल है।
बहरहाल, यदुवंशी कृष्‍ण की नगरी मथुरा के वाशिंदों को नए जमाने का ऊपरवाला तबियत से बिजली के झटके दे रहा है। उनकी नींद हराम कर रखी है। रोज रात को नौ साढ़े नौ बजे ऊपर वाला मथुरा की बत्‍ती गुल करता है और फिर मध्‍यरात्रि में एक बजे मेहरबान होता है।
पूछने पर कहता है कि तुम्‍हारा यदुवंशी रात 12 बजे पैदा हुआ था। उसका हैप्‍पी बर्थडे आने वाला है। मैं तो तुम्‍हें जागने की प्रेक्‍टिस करा रहा हूं। अब दिन ही कितने बचे हैं।
चैन से सोना है तो जागने की रिहर्सल जरूरी है। वो ऊपरवाला तुम्‍हारा ध्‍यान रखता है तो मैं तुम्‍हें कैसे भूल सकता हूं।
नए जमाने के ऊपर वाले का संदेश भी साफ है। सैफई से तीन पीढ़ियां प्रकट होने के बावजूद मथुरावासियों ने आज तक उन्‍हें दिया क्‍या। हर चुनाव में झुनझुना पकड़ाया और उम्‍मीद करते हैं कि चौबीसों घंटे बिजली मिल जायेगी।
यह बात अलग है कि नए जमाने के ऊपरवाले का नाम बदनाम न हो इसलिए उसने नीचे वाले अफसरों को समझा रखा है कि मैं सभी में व्‍याप्‍त हूं लिहाजा नाम बदल-बदल कर मेरा उपयोग किया करो।
मसलन कभी कहो कि बिजली ऊपर से नहीं है तो कभी कहो कि अनपरा से नहीं है। कभी बताओ कि मुरादाबाद से समस्‍या है तो कभी बताओ कि आगरा की पीली पोखर बिजली पी गई है।
इतने से भी मन भर जाए तो कान्‍हा के गोकुल और वृंदावन का नाम ले दो, बता दो कि समस्‍या वहां हैं। समस्‍या से निजात पानी है तो पापी मन, प्रभु को पहचान।
पहचान कि 2017 की विकट समस्‍या है। मथुरा की राशि में मोदी, मुलायम और मायावती विद्यमान होंगे। लग्‍न में मोदी मित्रभाव से बैठा है तो आठवें घर में मुलायम शत्रुभाव से। मायावती की न मोदी से बनती है और न मुलायम से इसलिए वह मथुरा के प्रति सदा तटस्‍थभाव से बैठी रहती हैं। दिनों के फेर उसकी माला के मनके में होते ही नहीं। उसकी माला में तो हर मनका समय और माया के हेर-फेर से आगे बढ़ता है। वर्ना सुमरनी पर आकर अटक जाता है।
खैर…बिजली का करंट बिजली आने से कहीं अधिक न आने पर झटका देता है, इसका इल्‍म ब्रजवासियों को भलीभांति हो चुका होगा। सूखे शंख कैसे बजते हैं, इसका पता तब लगता है जब बिना बिजली के बिजली का भारी-भरकम बिल सामने आता है।
और हां, क्‍या मजाल किसी की कि कोई बिल देने में आनाकानी कर जाए। ऊपरवाले की कृपा से नीचे वालों के हाथ बहुत लंबे हैं। बिजली आये न आये, बिल आयेगा और जमा भी करना होगा।
नहीं किया तो डंडा बजाने से लेकर डंडाडोली करके उठा ले जाने तक का बंदोबस्‍त ऊपरवाले ने कर रखा है। उसके कारिंदे सब जानते हैं कि सीधी उंगली से घी न निकले तो उंगली टेढ़ी कर लेनी चाहिए।
छप्‍पर फाड़कर गर्मी दे रहा है वो ऊपरवाला…तो दिल खोलकर बिल भेज रहा है ये ऊपरवाला। कंपटीशन जारी है बिना बिजली के।
चार घंटे की रात्रिकालीन एकमुश्‍त बिजली कटौती सिर्फ इसलिए है जिससे जान सको कि करनी का फल हर हाल में भोगना पड़ता है। एक विधायक नहीं… सांसद नहीं… यहां तक कि नगरपालिका भी नहीं…तो बिजली भी नहीं। बिन बिजली सब सून कहीं नहीं लिखा। बिन पानी सब सून जरूर लिखा है।
पानी की कोई शिकायत नहीं है, सबकी आंखों में पानी है। बिजली ने रुला जो रखा है। सरकार की बात मत करना। सरकार की आंखों का पानी सूख गया है। वैसे भी उसका काम रोना नहीं, रुलाना है।
और हां…2017 तक रुलाने का अधिकार तो हम-आप सभी ने दिया है उसे। फिर रोइए…रोते रहिए..और रात एक बजे तक का इंतजाम करके रखिए।
कुछ न मिले तो छत पर खड़े होकर आवाज लगाइए- जागते रहो…जागते रहो…क्‍योंकि सरकार और उसके नुमाइंदे ऐसी में सो रहे हैं।
नए जमाने के ऊपर वाले गहरी निद्रा में लीन हैं। पुराने जमाने का ऊपर वाला बांसुरी बजाने में तल्‍लीन हैं।
तुम किस खेत की मूली हो, खुद तय कर लो। मुझे तो पता नहीं।
खुदा जाने या खुद जानो।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

नींद रातभर क्‍यों मुझे नहीं आती ?

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
नींद रातभर क्‍यों मुझे नहीं आती? मेरे जैसे तुच्‍छ आदमी के लिए यह एक यक्ष प्रश्‍न है क्‍योंकि बचपन से सुना करता था कि ऐसी बीमारियों पर बड़े लोगों का आधिपत्‍य है। ग्‍लोबल भाषा में कहें तो धनकुबेरों ने इस बीमारी का पेटेंट अपने नाम करा रखा है लिहाजा किसी से इसका जिक्र करना तक मुनासिब नहीं समझता। कहीं कोई मुझे बड़ा आदमी न समझ बैठे।
समस्‍या का समाधान खुद निकालने की गरज से जब नींद न आने की वजह तलाशने लगा तो पता लगा कि समस्‍या की जड़ में इन दिनों चल रही वो सियासत है जिसकी तुलना गुंडे किस्‍म के सड़कछाप आवारा छोकरों की उस शब्‍दावली से की जा सकती है जिसे तथाकथित सभ्रांत लोग गालियां कहते हैं।
एक कहावत है जो गाहे-बगाहे हिंदी प्रेमियों के मुंह से सुनी जाती है। कहावत कुछ यूं है कि ”अंग्रेज चले गए और औलाद छोड़ गए”। कहावत का मर्म आप भी समझ गये होंगे।
खैर, अब न राजे-रजवाड़े रहे और न उनकी शानो-शौकत। न रियासत रहीं, न विरासत। जो रह गई है वह है सियासत…और वो भी उस दर्जे की जिसका जिक्र मैं ऊपर कर ही चुका हूं।
रात को किसी न किसी टीवी न्‍यूज़ चैनल पर उस कार्यक्रम को देखकर बिस्‍तर पकड़ता हूं जिसे आम आदमी पैनल डिस्‍कशन कहता है। न्‍यूज़ चैनल वाले पहले रात 11 बजे बाद ही डरावने कार्यक्रम दिखाते थे लेकिन अब 9 बजे से ही शुरू हो जाते हैं। मेरी नींद उड़ने का यही कारण है।
जैसे-तैसे सोने की कोशिश करता हूं तो कोई न कोई सियासती बाजीगर आंखों में उतर आता है।
मजमे के बीच वह बोलता है- साहिबान…अब मैं आपको ऐसे-ऐसे खेल दिखाऊंगा कि आप दांतों तले उंगली दबाकर रह जायेंगे।
हां, तो जमूरे… सबसे पहले साहब लोगों को पलटी मारकर दिखा। दिखा कि एक पार्टी से दूसरी पार्टी तक कैसे पलक झपकते ही पहुंचा जा सकता है।
साहब लोग समझते हैं कि देश में कई पार्टियां हैं और कई नेता। सच तो यह है कि ढेर सारी पार्टियां और ढेर सारे नेता, एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं।
कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, लोजपा, तेदेपा, आप और बाप सरीखी जितनी भी पार्टियां दिखाई देती हैं, वह सब एक प्राण कई देह हैं। यानी सबका रूप भले ही अलग-अलग है किंतु रूपक एक ही है। सूरतें जुदा हैं, सीरतें एक हैं।
जमूरे वोट डालने मात्र का अधिकार प्राप्‍त इन साहिबान को बता कि सत्‍ता किसी को प्राप्‍त हो, सिंहासन पर कोई बैठे लेकिन शासन में हिस्‍सेदारी सबकी रहती है।
जमूरे…साहब लोगों को ये भी बता कि पापी पेट की खातिर इन्‍हें क्‍या-क्‍या नहीं करना पड़ता।
ये सत्‍ता पक्ष और विपक्ष का नाटक खेलते हैं। संसद में कभी शीतकालीन सत्र खेलते हैं तो कभी वर्षाकालीन। कभी-कभी तो संसद से सड़क तक खेलते हैं।
व्‍यापमं की तरह ये हर जगह व्‍याप्‍त हैं। ललित मोदी की तरह इनकी ललित कलाओं का फैलाव भारत से लंदन तक विस्‍तार लिए हुए है। इनके लिए सुषमा, वसुंधरा, जैटली से लेकर वाड्रा, प्रियंका व चिदंबरम तक सब समान हैं। ये जब चाहें और जिसे चाहें मोहरा बनाकर अपना खेल शुरू कर देते हैं। जनता की कमाई पर इनका संपूर्ण एकाधिकार है, सर्वथा हकदार हैं ये उसके। इसीलिए तो ये कभी सरकार के नाम से पुकारे जाते हैं तो कभी विपक्ष के नाम से किंतु हकीकत यह है कि सत्‍तापक्ष भी ये हैं और विपक्ष भी ये ही हैं।
ये जब तक चाहते हैं संसद चलने देते हैं और जब मन नहीं होता तब उसी को खेल का मैदान बना लेते हैं।
जमूरे… साहिबान और कद्रदानों को यह भी जानकारी दे कि उन्‍हें जो कुछ होता दिखाई देता है, वह उसका भ्रम मात्र है। एक्‍चुअली जो ये सब मिलकर करते हैं, वह तो दिखाई ही नहीं देता। समझदार थे अंग्रेज जो मीटिंग, ईटिंग और चीटिंग की पर्याप्‍त व्‍यवस्‍था कर गए।
आज पूरा देश इन्‍हीं तीन कार्यों में व्‍यस्‍त है। जो इनमें से किसी एक काम को भी नहीं कर रहा, उसे अरविंद केजरीवाल ठुल्‍ला नहीं मानते। केजरीवाल ने दिल्‍ली का मुख्‍यमंत्री बनने के बाद दिल्‍ली और देश को बेशक कुछ और न दिया हो किंतु जिस तरह कपिल शर्मा ने अपने कॉमेडी शो से बाबाजी का ठुल्‍लू दिया, उसी तरह अरविंद केजरीवाल ने अपनी कॉमेडी सरकार से ‘ठुल्‍ला’ निकाल कर दिया है।
जहां तक सवाल राहुल गांधी का है तो जमूरे…साहिबानों को बता कि कुछ लोग जैसे कभी कुछ करने को पैदा नहीं होते, उसी तरह राहुल गांधी कभी बड़े होने को पैदा नहीं हुए। वह राहुल बाबा थे और राहुल बाबा ही रहेंगे।
कल की तो बात है जब सलमान खान की टिप्‍पणी पर उनके पिता सलीम खान को कहने पड़ा कि वह नासमझ है…प्‍लीज! उसकी बातों पर गौर न करें। राहुल और सलमान में एक बड़ी समानता है, दोनों ही अब तक पालने में झूल रहे हैं। उम्र का अर्धशतक लगा चुके लेकिन मिल्‍क चॉकलेट है कि मुंह से छूटती ही नहीं।
जमूरे…लोगों की प्रॉब्‍लम यह है कि वह नेता और अभिनेताओं के दीवानगी की हद तक मुरीद होते हैं। मीडिया की प्रॉब्‍लम यह है कि वह जो कुछ प्रसारित व प्रकाशित करता है, सब जनहित में करता है। कॉन्‍डोम के विज्ञापन से लेकर डीयो तक के विज्ञापन में जनहित निहित है।
गंडे, ताबीज तथा लॉकेट से लेकर तेल, साबुन और क्रीम तक…सबके विज्ञापन मीडिया जनहित में ही तो जारी करता है।
ठीक इसी प्रकार हर दिन किसी न किसी मुद्दे पर पैनल डिस्‍कशन कराना सबसे बड़ा पुण्‍यकार्य है। इससे जनता का ध्‍यान इधर-उधर नहीं भटकता। वो अपने नेताओं पर फोकस किये रहती है।
वो चैनल ही क्‍या, जो ब्रेन वॉश न कर सके। मोदी जी का एक महत्‍वपूर्ण मिशन है क्‍लीन इंडिया। न्‍यूज़ चैनल यही कर रहे हैं। पूरी तरह ब्रेन वॉश कर देते हैं।
यूं भी कहा जाता है कि गंदगी भी दिमाग की उपज है। यदि दिमाग खाली रहेगा तो कहीं गंदगी नजर नहीं आयेगी।
मेरा भी दिमाग न्‍यूज़ चैनल्‍स ने पूरी तरह खाली कर दिया है। ब्रेन वॉश कर दिया है।
पुरानी कहावत है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है। उधर मैंने न्‍यूज़ चैनल पर पैनल डिस्‍कशन देखा और इधर दिमाग देश दुनिया से पूरी तरह खाली हो जाता है। रह जाते हैं तो शैतान रूपी वह नेता, जो मेरी नींद के दुश्‍मन हैं।
अगर आप भी नींद न आने की बीमारी से पीड़ित हैं तो किसी वैद्य, हकीम, डॉक्‍टर या झोलाछाप के पास जाने से पहले एकबार खुद अपने मर्ज पर गौर करें। कहीं आपकी नींद भी मेरी तरह इन नेताओं ने तो नहीं छीन ली।
आमीन…आमीन…आमीन!
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

Tuesday, 16 July 2013

लल्‍लनजी और पप्‍पूजीओं का देश

(लीजेण्ड न्यूज़ विशेष)
टीवी सीरियल लापतागंज का एक किरदार है लल्लनजी। लल्लनजी एक सरकारी मुलाजिम हैं और उनका तकिया कलाम है- हमसे तो किसी ने कहा ही नहीं।
काम कैसा भी हो, लल्लनजी से जब तक कोई कहता नहीं है तब तक वह कुछ नहीं करते। यहां तक कि खाना-पीना, उठना-बैठना भी उनका किसी के कहे बिना नहीं होता।

इसी प्रकार का एक दूसरा टीवी सीरियल था हम आपके हैं इन-लॉज। यह सीरियल हालांकि अपनी उम्र पूरी किये बिना ही दम तोड़ गया लेकिन उसका भी एक किरदार लापतागंज के लल्लनजी से प्रभावित था।
पप्पूजी नाम के इस किरदार का तकिया कलाम था- मैं नाराज हूं। वह कभी भी किसी बात पर वक्त-बेवक्त नाराज हो जाया करता था। घर जमाई के इस किरदार की खासियत यह थी कि वह ज्यादा देर तक किसी से नाराज नहीं रह पाता था। ये बात और है कि कुछ दिनों में ही दर्शक उससे नाराज हो गए ।
आप चाहें तो इसे इत्तिफाक मान सकते हैं कि हमारी राजनीति में भी ठीक इसी प्रकार के चरित्र हैं, हालांकि राजनीति की तुलना किसी टीवी सीरियल से नहीं की जा सकती। ये बात और है कि राजनीति हमेशा से नाटक-नौटंकी तथा फिल्म वालों का पसंदीदा विषय रही है।